साहित्य
-
टेढ़ जानि शंका सब काहू
जरूरी नहीं है कि गलती करने की ही क़ीमत चुकानी पड़ती है, कभी कभी ज़्यादा अच्छा होने की क़ीमत इंसान…
Read More » -
Activity
मेरी आकृति क्या है बताओ गिन गिन कर इसकी भुजा बताओ भुजा बताओ, कोण,शीर्ष बताओ त्रिभुज मेरी आकृति क्या हैं…
Read More » -
ग़ज़ल
किससे किसको डर लगता है। खुद को खुद से डर लगता है । शैतानों से क्या कहने अब, इंसानों से…
Read More » -
यह बस छोटी सी जिंदगी लेकिन काम बहुत है
1 यह छोटी सी जिंदगी लेकिन काम बहुत है। मेहनत करने वाले को यहां ईनाम बहुत है।। मत पड़े रहो…
Read More » -
लघु कथा आदमी और कुत्ता
मेरे घी के नीचे वाले में मेरे ए टी म मशीन थी हटा दी दुकान खाली थीं कुछ दिन बाद…
Read More » -
गुनगुनी धूप
अलसाई गुनगुनी धूप में बैठते ही भूली बिसरी यादों की तस्वीरें दिल पर बार बार दस्तक दे मन को टटोलने…
Read More » -
गुनगुनी धूप अलसाई गुनगुनी धूप में बैठते ही भूली बिसरी यादों की तस्वीरें दिल पर बार बार दस्तक दे मन को टटोलने लगती है। कुछ खट्टी, कुछ मीठी यादें सुंदर तानो-बानो में सजी दिलों में दबे एहसासों को सहलाती जाने अनजाने बेवजह चली आती हैं। गुनगुनी धूप में अलसाई इन्द्रियाँ अनजाने के सफ़र पर निकल भूत, भविष्य और वर्तमान के अनछुए क़िस्से सुनाने लगती है। गुनगुनी धूप में बैठ बुने स्नेह धागों के ताने-बानो संग दिल्लगी, चुहलबाजी, हँसी ठिठोलियाँ अपनत्व का राग गुनगुनाने लगती है। शीतल हवाओं की मन्द मन्द छुअन लहलहाते फूलों की महक गुनगुनी धूप की गर्माहट सुकून का एहसास दिलाने लगती है। स्वरचित मौलिक रचना सुमन बिष्ट
अलसाई गुनगुनी धूप में बैठते ही भूली बिसरी यादों की तस्वीरें दिल पर बार बार दस्तक दे मन को टटोलने…
Read More » -
खुश रहें
हक है सभी को खुश रहने का, अपनी-अपनी रची-रचाई दुनिया में। फिर चाहे वो जीव हो या जन्तु, चर हो…
Read More » -
_पड़ गये ,होली के रंग फीके
गीत _पड़ गये ,होली के रंग फीके पड़ गये ,होली के रंग फीके। रिश्ते हो गये,तार-तार, ना अदबी रहे सलीके।…
Read More » -
स्वयं के भीतर
लगे आज स्वयं के भीतर बरसों बाद लौटी आई वही असाहय, अकेली, तन्हाई और दर्द से घिरी बस कलम चला…
Read More »