
शबनम की गोद से होकर आजाद वो किरण
आशा और उम्मीदों की बनकर के वो किरण,
चल पड़ी है वो बिखेरने को अपना प्रकाश
और ,हरने को जग से उस तम को,
जो चहुँ ओर है पसरा हुआ सा,
लगाकर पँख इच्छाओं और आशाओं का
उड़ चली है वो उन्मुक्त गगन की ओर,
आशा और उम्मीदों की बनकर के वो किरण |
चली है कराने को आजाद उन बेबस अबलाओं को
जो कैद में थीं सदियों से…,
पुरातन पंथी बंदिशों में और थीं वो जकड़ी हुईं
परम्पराओं और कुरीतियों की जंजीरों से,
लड़ी वो एक लम्बी लड़ाई अपनों से और
ज्ञानी और ज्ञान के ठेकेदारों से
नारी शिक्षा के अधिकार के लिए,
किया था लम्बा और कठिन संघर्ष,
और दिए थे कई परीक्षा
पाने को अधिकार शिक्षा का
देश की नारी वर्ग के लिए,
आशा और उम्मीदों की बनकर के वो किरण |
शशि कांत श्रीवास्तव




