साहित्य

नहीं चाहिए युद्ध

वीणा गुप्त

अरे युद्ध पिपासुओं!
निहित स्वार्थों की
दलदल में पतित
कुटिल नीतिज्ञों!
करो युद्ध विराम।
फौरन,अभी,
बिल्कुल अभी।

बताओ तो,
तुम्हें शांति और प्रेम के
गीतों से परेशानी  क्यों है?
मुस्कान और हरियाली
तुम्हें क्यों नहीं भाती है?
क्या धड़कता नहीं है
एक जज़्बातों भरा दिल
तुम्हारे सीने में ।
क्यों सबके सुख की भावना
तुम्हें अकुलाती नहीं है।

यदि बची है एक किरच भी
इंसानियत की तुममें,
तो रोको युद्ध यह,
अभी,अभी और अभी।
मत जोडो़,
हैवान को भी शर्मसार करता
रक्त रंजित,दुर्गंधभरा,,
कलंकित अध्याय
मानवता के इतिहास में ।
अतीत के सबक लो,
उसे दोहराओ मत।

जानते हैं सब
शील,विनय से युक्त शक्ति ही
वरदान कहलाती  है।
सम्मान पाती है।
अनियंत्रित शक्ति ,
विनाश और विध्वंस है।
तांडव है महाकाल का।
यह करती है कोख बंजर
धरती मांँ की,
उसे कुरूप,अभिशप्त बनाती है।

युद्ध सदा से  देता आया है,
देता रहेगा विश्व  को,
एक अपूरणीय क्षति।
प्रतिहत,बाधित प्रगति,
बिलखता वर्तमान ,
निर्माणों का अवसान।
मरघटी भयावह नीरवता।
विवशता की घुटन
अंधकार भरा भविष्य
गुम होती रोशनी
मूल्यों का हनन
संवेदनाओं का पतन।
रुदन का हास्य,
हास्य का रुदन।

क्या यही चाहा था,
युगों युगों संघर्ष रत
विकसित सभ्य मानव ने ?
इसी के लिए किया था
क्या अथक श्रम?
अनगिन हाथ- पैरों के
कर्म और गति को
मत करो पंगु।
करो युद्ध विराम  ।
सदा सर्वदा के लिए

यदि चाहते  हो ,
मानवता जिए,खिलखिलाए।
बहे आशा भरी वतास।
प्राणों में हो सद्भाव- सुवास।
विश्व में गूंजे शांति का राग।
परचम प्रगति का लहराए।
सुखद सुंदर बने जीवन सबका।
उषा सतरंगी कलश ढुलकाए ।।

तो अनुरोध मेरा ,
उन सबसे
जो मानवता के हामी हैं।
करो युद्ध विराम ।
फौरन,अभी और अभी
सदा -सर्वदा के  लिए।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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