
अटल जी की वाणी से, हमने जीना सीखा है,
अंधियारों के सीने में, दीया जलाना सीखा है।
कहा था उन्होंने— ‘हार नहीं मानूँगा’,
वही संकल्प हृदय में, हमने ठानना सीखा है।
बाधाएँ आती हैं आएँ, घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पर कदम मिलाकर चलना, हमने साथ सीखा है।
उनकी कविता मात्र शब्द नहीं, जीवन का दर्शन है,
साधारण से असाधारण होने का, एक समर्पण है।
काल के कपाल पर, उन्होंने जो लिखा मिटाया नहीं,
झुकना और थकना, उनके पथ ने सिखाया नहीं।
वे शब्द रूप में जीवित हैं, हमारे हर विचार में,
अटल प्रेरणा गूंज रही है, भारत के हर द्वार में।
“हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ, गीत नया गाता हूँ।”
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)




