साहित्य

चौधरी साहब और खामोश कुत्ते.. बाल-कहानी

जयचन्द प्रजापति 'जय'

एक छोटे से गांव में चौधरी साहब रहते थे। वे बहुत अमीर थे, लेकिन कुत्तों से सख्त नाराज़। “ये कुत्ते रात भर भौंक-भौंक कर नींद उड़ा देते हैं!” वे गुस्से से कहते। भले ही कुत्ते गांव की रक्षा करते, चौधरी साहब उन्हें अपशकुन मानते। जैसे ही कोई कुत्ता भौंकता, वे लाठी लहराते दौड़ पड़ते। “चुप रहो, शैतानो!” चिल्लाते।

गांव के कुत्ते दुखी थे। “हम तो चोरों से बचाते हैं, फिर भी पिटते हैं,” वे आपस में बड़बड़ाते। लेकिन चौधरी साहब नहीं मानते। उनकी पत्नी कहतीं, “अरे, ये निरीह जानवर हैं। इन्हें मारना ठीक नहीं।”

एक काली रात आई। चांद बादलों में छिपा था। चोर चुपके से चौधरी के घर घुसे। सामान लूटने लगे। लेकिन… कोई भौंकने वाला नहीं! क्यों? क्योंकि उसी शाम चौधरी साहब ने सारे कुत्तों को लाठियों से पीट दिया था। दर्द से कराहते कुत्ते चुप थे। चोरों ने ढेर सारा अनाज, बर्तन और कपड़े लूट लिए।

सुबह चौधरी साहब को खबर मिली तो वे आसमान पर चढ़ गए!”आज चोरी होनी थी तो सारे कुत्ते खामोश हो गए? ये क्या जादू है?” वे गालियां बकते फिरे। पत्नी ने हंसते हुए कहा, “आपने ही तो कल इन्हें मार-मार कर बोलने के लिए मना कर दिया। अब बेचारे क्या करें? दर्द में चुप हैं।”

चौधरी साहब शर्म से लाल हो गए। उन्होंने कुत्तों को दूध पिलाया, मरहम लगाया। “माफ करो, मेरे वीर पहरेदारो। तुम्हारे बिना हमारा गांव लुट गया!” कुत्ते खुश होकर पूंछ हिलाने लगे।

तब से चौधरी साहब समझ गए—भौंकना बुरा नहीं, वो तो रक्षा का संकेत है। गांव में सब हंसते: “कुत्ते के भौंकने से चौधरी का भौंकना बंद!”

जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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