साहित्य

कुष्मांडा मैंय्या

बसंत श्रीवास *वसंत*

या देवी सर्वभूतेषु माँ कुशमाण्डा रूपेण संस्थिता।
।।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

चतुर्थशक्ति हैं जग जननी हो माता।
कालिमा जगत के तुम्ही प्रकाशिनि।।
अन्नपूर्णा भी तुम्ही जगत की माता।
अष्टसिद्धि नवनिधि मोक्ष के दायिनी।।

ब्रम्हांड निर्माणी, माँ जग कल्याणी।
आदिशक्ति, कुष्मांडा कहलाती है।।
नारंगी चूनर पीतवस्त्रधारी हो माता।
होके सिंहसवार अष्टभुजी आती है।।

शंख चक्र शूल तीर तलवार हस्त माँ।
गदा, पुष्प, गुल, गुड़हल हार सुहाए ।।
बलि कुम्हड़ फल भोग मालपुआ मां।
मुदित मन से रुचि रुचि भोग लगाए।।

सुर संत मुनि जन जगत के रक्षक।
वरदायिनी माँ सूर्यलोक निवासिनी।।
ब्रम्हा विष्णु सदा दर शीश झुकाते।
स्वास्थ्य, समृद्धि यशकीर्ति दायनी।।

है नवरात्रि देखो ढोल झांझ मंजीरा।
बज रहे मां की सेवा धमा धम-धम।।
सौम्य सुहासिनी,सुमधुर भाषिणीम।
जगदात्री है माँ कुष्मांडा चतुर्थकम।।

बसंत श्रीवास *वसंत*(नरगोड़ा)
रामकृष्ण मिशन आश्रम नारायणपुर छत्तीसग

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