साहित्य

जीने की सीख

राजीव त्रिपाठी

रात तनहाई ने फिर जगा दिया
ख़्वाब बनकर कोई खिड़की से आ गया!!
सोचा फिर कौन मेरा अपना है
अलावा मेरे कौन है जो मुझको लुभा गया!!
गम के सायों से रज़ामंदी हो गई
कौन मेरी ख़ुशियों को ठोकर लगा गया!!
मैं कितनों के उसूलों पर खरा उतरु
कौन शख़्स मुझको आईना दिखा गया!!
नींद से हड़बड़ी में जाग उठा
आपका ख़्याल फिर से आ गया!!
एक हादसे से अभी तक उबरा ना था
पलट कर देखा तो एक और आ गया!!
दामन तो मेरा ज़्यादा दाग़दार नहीं
यही सोच कर कोई उम्र गुज़ार गया!!
मेरे जीने का भरम भी झूठा निकला
ज़िन्दगी जीने में मुझको पसीना आ गया!!
दिल टूटने में टूट भी जाता हमारा लेकिन
एन वक्त पर कोई जीना सीखा गया!!
आप पर ज़िन्दगी ज़्यादा रही मेहरबान
आपको जीना तो कम से कम आ गया..!
– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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