साहित्य

छुट्टे पैसों में सपने

ऋतु गर्ग

आज जब कथा संपूर्ण हुई,
आरती के बाद
वह टटोल रही थी अपना पर्स
और ढूँढ़ रही थी
कुछ छुट्टे पैसे।
हाँ,
कुछ पाने की आस में
वह अपने पर्स में
कुछ उम्मीदें भरकर लाई थी।
एक पर्स में छुपे
वे गिने-चुने रुपए,
जिनमें वह खोज रही थी
अपने परिवार के सपने।
सोच रही थी—
कुछ पैसों से
भगवान तो खुश हो जाएंगे,
मगर
परिवार नहीं चलेगा।
अपने सवालों के जवाब
वह खोज रही थी
उस आरती की थाली में,
और धीरे-धीरे
मन्नतों से
अपनी झोली भर ली थी।
आँखों में कुछ सपने लिए
वह
परिवार की खुशियाँ
तलाश रही थी।
खुद के लिए
कोई सपना बचा न था,
क्योंकि वह
माँ, बहन, पत्नी बनकर
दीये की रोशनी में
आहुति बन रही थी।

— ऋतु गर्ग, सिलीगुड़ी,पश्चिम बंगाल

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