
जिससे रोशन आत्मा मेरी
मैं वो चिराग बुझा बैठा
हर अंधेरा मिटाया जिसने
मैं वो चिराग मिटा बैठा
जो करता रहा रोशन सदा
मैं रोशन उसे रख न सका
फैलाया जिसने प्रकाश यहां
मैं अंधियारा फैला बैठा
जिससे रोशन आत्मा मेरी
मैं वो चिराग बुझा बैठा
जिसकी नज़रों से जहां देखा
मैं वो नज़र मिटा बैठा
जो कहती थी हरदम मुझसे
लौट आओ राह मेरी
है पथिक तुम साथी हो मेरे
मत भटको राह तुम फिर से
मैं उसकी राह न जाकर के
वो पथ अपना मिटा बैठा
प्रकाश की ओर जो ले जाती
मैं अंधियारा समझ बैठा
जिससे रोशन आत्मा मेरी
मैं वो चिराग बुझा बैठा
कवि,गीतकार:- धीरज कुमार शुक्ला’फाल्गुन’
ग्राम -पिपलाज,तहसील -खानपुर,जिला झालावाड़ राजस्थान




