साहित्य

चलो ढूँढ़े पत्ता हरा

वीणा गुप्त

(1)

जीत लेंगे हरेक बाज़ी
*****************
जब ज़रूरत पड़ी,
हमें अपने सहारों की,
झेल न पाए मार हम,
निष्ठुर प्रहारों की।
बड़ी हसरतों से देखा,
तूने सहारा न दिया।
कैसे कह दूँ ज़िंदगी,
तूने सही हिसाब किया।

हर कैफ़ियत मुझसे ही माँगी,
कोई जबाव न दिया।
कैसे कह दूँ ज़िंदगी,
तूने सही हिसाब किया।

तेरी इस अदा पे हम,
फ़िदा होते ही गए।
तुझे पाने की चाह में
ज़ुदा होते ही गए।
रास्ता कोई निकल आता,
तूने इशारा न किया।

देर अब भी हुई नहीं,
आस अब भी बाकी है।
मत बैठ पत्थर बन कर तू,
एहसास अब भी बाकी है।
परवाने ने रोशन शमा से,
कह तो किनारा कब किया?

रीत प्रीत की न जाने,
ऐसा तू अनाड़ी है।
खेलने से पहले हारा,
कैसा तू खिलाड़ी है।
जीत लेंगे हरेक बाज़ी,
साथ तूने गर दिया।

(2)
इंकार
******
मुझे संवेदनाएं मत दो,
छलनामयी निठुर संवेदनाएंँ,
पीड़ा को सहलाकर
पीड़ित कर जाती हैं।
पाकर संवेदना,
जब पिघल पिघल उठता है,
यह नवनीत मन,
तो ये संवेदनाएं,
मुस्कराती हैं।

छले जाने का एहसास,
व्यथा को गहरा जाता है।
संवेदना नागफनियों का कांटा,
अंतर तक चुभ जाता है।

नहीं चाहिए यह प्यार मुझे,
मुझे मेरे दुःख सागर में,
आकंठ डूब जाने दो,
उत्ताल लहरों में,
डूबने-उतराने दो।
छोड़ दो मुझे एकाकी
असहाय ठोकर खाने को,
खुद ही संभल जाने को,

तमस भरी अनदेखी राहों पर
मुझे पथ अपना बनाने दो।
अपने पाँव के छालों को,
खुद ही सहलाने दो।

मुझे मत प्यार दो,
यह मुझे न रास आता है।
यह मुझे अक्षम बनाता है।
समेट लो सब कोमलता
सब मधुरिम आश्वास,
आत्मीयता औ विश्वास,
यह मुझमें लाचारी जगाता है।

देना ही है तो दो
एक चोट और,
दर्द एक नया,
इससे मेरा पुराना नाता है।

मैं खुद ही पोंछ लूंँगा,आंँसू अपने
ये मेरी व्यथा का उपहार हैं।
कैसे बाँट लूं मैं इन्हें ,
ये ही तो हैं जिसपर मेरा,
केवल मेरा अधिकार है।

मुझे ये आँसू बहाने में,
आनंद आता है।
संवेदना नागफनियों की,
चुभन पर मरहम
लग जाता है।
नहीं चाहिए संवेदना,
नहीं चाहिए कोई प्यार,
कृतज्ञ मैं तेरा,
कर यह इंकार स्वीकार।

(3)
गूंज उठी तनहाई है
****************
ऋतु बीत गई विश्वासों की,
बेवफ़ाई पर बहार छाई है।
आशा का चमन वीरान हुआ,
गूँज उठी तन्हाई है।

शहर सारा सो रहा है,
जाने कैसा हो रहा है ,
सो गईं हैं किरणें सारी,
तम ही पहरा दे रहा है।

तम की छलना से छली ,
रोशनी घबराई है।
आशा के वीरान चमन में,
गूँज उठी तन्हाई है।

मंजिलें सब खो गई हैं,
आहटें सूनी हो गई हैं,
धुंधला गई है दृष्टि उजली,
भावनाएँ रो गईं हैं।
भटकाव की मरीचिका ही,
बन बैठी सच्चाई है।

आशा के वीरान चमन में,
गूँज उठी तन्हाई है।

मन पाँखी आकुल हो रहा है,
उड़ान अपनी खो रहा है,
व्योम की निस्सीमता में,
अस्तित्व बौना हो रहा है।

पराजय सच नहीं जीवन का,
आशा चमन महकेगा फिर ,
अशेष है जीवन का स्वर,
हरित लहर लहराई है।

(4)

चलो ढूँढें पत्ता हरा
*****************
पेड़ सब ठूंठ हो गए हैं,
शहर बियावां हो गया है।
चलो इस पतझार में ही,
कोई पत्ता हरा ढूँढें।

क्या पता मिल जाए ,
किसलय कोई,
किसी सूखी डाल की
गोद में किलकता।
पत्ता ये मिल गया तो,
तलाशना नहीं पड़ेगा,
बहाना जीने का,
ओढ़ना न पड़ेगा
मुखौटा कोई,
सफर ज़िदगी का
आसान हो जाएगा।

सब ओर गूँज रहा शून्य ,
चलो इस शून्य में तलाशें,
किसी खोई सरगम को,
सरगम जिसे मन-साज पर,
लहरा रहीं टीसती उँगलियाँ,
गर धुन ये पड़ी सुनाई ,
तो ढुलकना आंँसू का,
बेकार न जाएगा।

धरती तप रही है,
आकाश भी निष्ठुर बना,
गति और पथ के मध्य,
घमासान सा ठना,
श्रमबिंदु सागर बन गए हैं,
किनारे भी ओझल हुए हैं,
चलो मंझधार में पैठें,
मचलती लहरों से भेंटे,
कोई तो उठेगी लहर वह,
आवर्त किनारा हो जाएगा।

घटाएं हैं,अंँधेरा है,
अमा सघन बरसती,
श्वास की है आस घुटी,
हिम्मत ने हिम्मत,छोड़ दी।
चलो पकडें जुगनू कोई,
चिनगी भर उजाला लें,
कर लें रोशनी,
क्षितिज गुलजार हो जाएगा।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली।

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