साहित्य

चमचे

विनोद कुमार सीताराम दुबे

खेल खिलाते चमचे
चमचों का बोलबाला है
वो अपना काम छोड़कर
चमचागिरी में लग जाते है
ये हर जगह नजर आते है
दूध को भी पानी बनाते है
सत्य को असत्य बनाते है
असत्य को सत्य बनाते है
अपना उल्लू सीधा करने में
चमचागिरी खेल दिखाते है
सरकारी ठिकानों के आस-पास
ये ज्यादा नजर आते है
नेताओं के ये बहुत प्रिय होते है
चमचे चमचागिरी करके
जनता का नहीं अपना काम बनाते है
सावधान हो जाओ प्यारे मित्रो
चमचों को अपना दोस्त न बनाएं
नहीं तो आप का घर उनका होजाएगा
आप घरके बाहर नजर आएंगे
वो घरके अंदर नजर आएंगे
चमचे चमचागिरी से प्रशासन को
यहां तक नहीं आने देंगे
आप हाथ मीजकर रह जाओगे
चमचों के चमचागिरी में उलझकर
आप बेसहारा नजर पाओगे
चमचे वालों से दूरी बनाए
जीवन को सुखमय समृद्ध मय बनाएं

विनोद कुमार सीताराम दुबे शिक्षक भांडुप मुंबई महाराष्ट्र
संस्थापक इन्द्रजीत पुस्तकालय सीताराम ग्रामीण साहित्य परिषद सामवन्ती ग्राम महिला विकास मंडल जुडपुर मड़ियाहूं जौनपुर उत्तर प्रदेश

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