साहित्य

ग़ज़ल

चनरेज राम *अम्बुज*

ये चरागाँ जल रहे हैं शाम से।
बे ख़बर हो ग़र्दिश-ए-अय्याम से।

सिर्फ मक़सद है कि रौशन हो जहाँ,
वास्ता क्या हिन्दू और इस्लाम से।

नज़रों से पीकर अभी मदहोश जो,
क्या फ़रक़ पड़ता उसे अब जाम से।

राह-ए-उल्फ़त पाँव जिसने रख दिया,
डर नहीं उसको किसी अंज़ाम से।

पाक़ दामन चाहते अपना अगर,
दूर ही रहना किसी बदनाम से।

गैरों की उँगली पकड़ तुम चल रहे,
मैं तो हूँ मशहूर अपने नाम से।

गर अदालत कर न पाए न्याय तो,
आस क्या है हाकिम-ओ-हुक्काम से।

अब तलक सीखा न तलवे चाटना,
इससे हूँ महरूम हर ईनाम से।

नेक राहों पर चला ताउम्र मैं,
पर बचा *अम्बुज* नहीं इल्ज़ाम से।

चनरेज राम *अम्बुज*
आजमगढ़ उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर- 9935738757

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