साहित्य

असमंजस (हास्य-व्यंग्य)

वीणा गुप्त

मंदिर में  खड़े -खड़े आख़िर भगवान जी का मन भी उकता ही  गया। कहाँ आ फंसे वे। जो भी यहाँ आता है आफत का मारा, दुखियारा। सबके दुखड़े सुनते- सुनते वे खुद को महा दुखियारा फील करने लगे हैं। नेगेटिव वाईव्स से घिरे  बैठे हैं वे। काश।कोई तो उनकी भी दो बातें सुनता। सब उनसे ही आस लगाए बैठे हैं। एक और बात उन्हें खटक रही थी। यहाँ कोई भी सीधे-सीधे अपनी बात नहीं कहता। कंडीशन रखते हैं। भगवान जी यह कर दो ,तो मैं इतने का प्रसाद चढ़ाउँगा। तेरे नाम से भंडारा करवाऊँगा। ये करूँगा, वो करूँगा। सब करूँगा। बस हाथ पैर नहीं हिलाऊँगा। क्योंकि यह काम तेरा है, तू ही कर। और खाने के नाम पर वही मिष्टान्न पूरी।  सुबह -शाम भजन कीर्तन,  अगर बत्तियों का दम घोंटू धुँआ। जी ऊब गया है इस एक सी जिंदगी से। बोरियत की हद हो गई है।
भगवान जी का मन यमुना का कछार, वंशीवट,  ब्रज का पनघट, गोपी- ग्वालों का प्यार, मैया की फटकार  सुनने को आकुल हो उठा।  बस, अब और नहीं रहेंगे वे यहाँ। उन्हें थोड़ा चेंज लेना ही होगा। भगवान जी ने अपना धनुष बाण, बाँसुरी  मोर पंख , पीताम्बर सब समेटे और वहाँ से निकल लिए ।
अभी पौ नहीं फटी थी। आसमान में कुछेक तारे  टिम टिमा रहे थे। हल्की भीगी ठंडी हवा चल रही थी। मौसम खुशनुमा था। वे एक पार्क की बेंच पकड़ कर ,धनुष -बाण और बाँसुरी  साईड में धर, अपना उत्तरीय तान कर सो गए। पूरी रात मन उथल- पुथुल था, सो नहीं  पाए थे ,अतः जल्द ही नींद आ गई।
इधर वे सोए,उधर मंदिर का चौकीदार उठ गया।
मंदिर का झाडू-पोंछा कर, पौधों को पानी देकर,
रोज की भाँति मंदिर के पट खोले, तो चौंक गया।भगवान की बेशकीमती मूर्ति वहाँ नहीं थी। भगवान अंतर्ध्यान हो चुके थे। ऐसा कैसे हो सकता है?  रात को खुद उसने सब देख भाल के, दरवाजा बंद किया था। सब ठीक- ठाक था। पर अब —। कहाँ चले गए प्रभु। वह बुरी तरह घबरा उठा। बामुश्किल तो उसे यह काम मिला था, मंदिर की चौकीदारी का। पूरे मंदिर का चप्पा- चप्पा छानकर वह बाहर की ओर भागा। दोचार कुत्ते भी उसके साथ- साथ लग लिए। उन्हें घुड़कता ,हुश- हुश करता वह  मूर्ति को ढूँढते- ढूँढते पार्क तक आ गया और वहीं एक बेंच पर सिर पकड़कर बैठ गया। संयोग से सामने वाले बैंच पर ही प्रभु जी आराम फरमा रहे थे। चौकी दार बहुत परेशान और घबराया हुआ था। उसने भगवान से मदद की गुहार लगाई, ‘ हे भगवान ! दयानिधान, कहाँ चले गए महाराज? लौट आओ प्रभु। मेरे पेट पर लात मत मारो। ” वह गिड़गिडा़या और फिर अपनी असहायता पर निराशा से भर कर रोने लगा। उसके रोने से भगवान की नींद खुल गई। उन्होंने पीताम्बर से मुंँह बाहर निकाल कर झाँका। दया निधान प्रभु,आदतन उसकी कुछ सहायता करने की सोच ही रहे थे कि उन्हें सुनाई पड़ा।  वह मन्नत मना रहा था ” पूरे इक्कीस  रूपए का प्रसाद चढा़ऊँगा। आप मिल जाओ न भगवान जी।” उसने हाथ जोडे़। उसकी इस हरकत पर भगवान जी उखड़ गए। खीझ कर बुद बुदाए ‘ राजा भोज से लेकर गंगू तेली तक सभी का एक  ही स्टाइल है। बस हैसियत के हिसाब से  रिश्वत दी जाती है। कैसा सड़ा हुआ सिस्टम है इस दुनिया का। अब भगवान जी इस झाँसे में आने वाले नहीं हैं। उन्होंने अपने पीत उत्तरीय को अपने बदन पर जोर से कस लिया। उधर चौकी दार  उन्हें भावनात्मक ब्लैक करने पर उतर आया था। “अरे माई बाप,  मेरे छोटे -छोटे बच्चों का तो ख्याल करो। अगर  तुम न मिले तो वे बेचारे भूखों मर जाएंगे। लौट आओ न प्रभु। ”
अपने दुख को शेयर करने के लिए उसने सामने लेटे भगवान जी को झिंझोड़ा। “अरे भइया, तूने किसी को देखा क्या यहाँ पर?मंदिर से भगवान की मूर्ति चोरी हो गई है। अरे, वही नीले रंग की ,पीले धोती कपड़ों वाली सुंदर से टीन एजर, मोर मुकुट धारी, मुरली वाले भगवान जी की मूर्ति ” भगवान जी उसकी बात सुन कर कसमसाए और अपने पैर चादर में अंदर समेट लिए। लेकिन ऐसा करते समय साइड में धरी उनकी बाँसुरी बेंच से नीचे गिर गई। चौकीदार ने उसे उठा कर गौर से देखा। यह तो भगवान की बांसुरी है। बस, फिर क्या था फौरन पीताबंर खींचकर  भगवान को उठा दिया। ” यह बाँसुरी तुम्हारे पास कैसे आई,तो तुम्हीं हो मूर्तिचोर।  बताओ कहाँ है मूर्ति ? कहाँ छिपाया उसे?” ” अरे भैया मैं ही हूँ वह मूर्ति, कोई चोर वोर नहीं हूँ। यह मेरी ही बाँसुरी है। बजा के दिखाऊँ।”
चौकीदार का पारा सातवें आसमान पर था। एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी। मूरख समझा है क्या मुझे।  यहाँ पेट पे लात पड़ने वाली है और तुझे मसखरी सूझ रही है। ठहर बच्चू, अभी चखाता हूँ तुझे मजा। वह गुस्से से उनकी ओर झपटा। भगवान का पीताम्बर पकड़ लिया।अब तक दिन की चहल -पहल शुरू हो गई थी । भीड़ इकट्ठी होने लगी। भगवान ने वहाँ से भागने में ही खैर समझी। उसके हाथ से पीताबंर झटक , मिस्टर इंडिया बन, पूरे रण छोड़ अंदाज में वे वहांँ  से उड़ लिए।  सीधे सरयू के तट पर लैंड किया।  चौकीदार आंँखें फाड़ हक्का- बक्का सा  हाथ में रह गई भागते भूत की लंगोटी यानि बांसुरी को घूरता रहा। फिर चिल्लाया “अरे पकड़ो कोई इस मूर्ति चोर को। भागा जा रहा है ।”
लोगों ने आकर उसे ही दबोच लिया। “साला  खुद चोर है। नौटंकी करता है। भगवान की मूर्ति को भी नहीं छोड़ा। ” जनता ने कानून हाथ में ले, उसे न्याय देने लगी।
इधर भगवान अपनी नींद में खलल पड़ने से परेशान थे। कोई  जगह ढूंढ रहे थे नींद पूरी करने  कि  इसी समय एक गेंद आकर उनके पैर पर लगी। उन्होंने उसे उठा लिया। अतीत की स्मृति सजीव हो गई। पहले भी इस गेंद ने उन्हें परेशान किया या था। उन्हें यमुना में उतर कर , बेमतलब ही कालिया से दो- दो हाथ करने पडे़  थे, क्या फिर ऐसा कुछ होने वाला है? नहीं वे अब  किसी पचड़े में नहीं पडेंगे। सामने से कुछ बच्चों ,यानि दामा, श्रीदामा और गोप ग्वालों की टोली आ रही थी। ‘भैया प्लीज गेंद पास कर दो न। ” गेंद को एक जोर की लात जमा कर , भगवान वहाँ से फौरन रफूचक्कर हो लिए। गेंद न जाने किस कुंज -लता में आराम फरमाने लगी। ग्वाल टोली  हैरान थी “वाह भई! बंदे ने क्या शॉट मारा है। काश यह हमारी टीम  में होता।”
अब सूरज चढ़ आया था। भगवान जी को भूख लगने लगी। मंदिर में होते ,तो नहा- धोकर माखन मिश्री कि भोग उड़ा रहे होते। अब क्या करें? तभी उनकी नज़र एक चाय वाले की टपरी पर पड़ी। वे वहीं पहुंच लिए। एक कप चाय और एक पैकेट बिस्कुट खाकर  जाने लगे, तो टपरी वाला चिल्लाया।” अरे भाई,पैसे तो दो। ऐसे कहाँ चल दिए।”  भगवान जी तो ठन -ठन गोपाल थे। अब तक न जाने कितनी दही- माखन की मटकिया चट कर डाली थीं। ऐसी समस्या से कभी पाला नहीं पड़ा था। उधर टपरी वाला मधुर वचनों का उच्चारण करता उन पर झपटा  तो  ये मैं नहीं माखन खायो वाले अंदाज़ में सफाई देने लगे।
” पैसे तो तुझे देने  ही होंगे नहीं तो बैठ यहीं पर और माँज बरतन। ” मरता क्या न करता। पूरे दो घंटे बरतन मांजकर श्रमदान किया तब जाकर छुटकारा मिला। अब भगवान जी टोटली थक चुके थे।इतना तो बालपन में गैया चराते हुए भी नहीं थके। उन्हें मंदिर की याद आने लगी। इस समय तक तो खा पीकर वे शयन करते थे। अब क्या करें? कहाँ जाएँ ? कुछ समझ नहीं आ रहा था। सरयू घाट की सीढियों पर बेठे- बैठे उनींदे हो रहे थे कि दो महिलाएं वहाँ आईं। कुछ प्रसाद बाँट रही थीं। भगवान जी को उनमें मैया दिखाई दी। फौरन ही उठे और उनके पास पहुँच गए। महिला ने उन्हें भी प्रसाद दिया और जाने लगी। उसके स्नेह भाव से भगवान जी पुलकित हो गए। मैया तो मैया ही होती है। फौरन मैया का अंचरा पकड़ , कन्हैया बन,लाड़ से बोले, ” मैया मैं भी तेरे साथ चलूँगा।’
“क्या कह,रहा है यह ” महिला हैरानी से बोली। “मेरे साथ चलेगा, क्यों?  मुझे किसी काम करने वाले की जरूरत नहीं है ? “कह कर वह आगे बढ़ी।
“अरी मैया, तू  अपने कन्हैया से नाराज है क्या, मैं अब तेरे संग ही रहूँगा।” कहते हुए उसने महिला का आँचल थाम लिया।
” छोडो  मुझे। यह क्या बदत़मीजी है और कौन है यह मैया? महिला घबरा कर चिल्लाई, “बचाओ, बचाओ “.उसकी आवाज सुन तीन- चार लोग उनकी तरफ दौड़ कर आने लगे ।भगवान जी भाँप गए जरुर कुछ गड़बड़ है। मैया का माथा आज ज्यादा ही गरम है। पिटवा के ही रहेगी। अभी तो अपना बचाव करना जरुरी है।  बाद में मना लूँगा मैया को।”  भगवान ने सोचा और गायब हो लिए।
अब कहांँ जाएं?  सड़क के किनारे खडे़ विचार  ही रहे थे कि एक आटो  वाले ने उन से पूछा “कहाँ जाना है?” अंधा क्या चाहे दो आँखें। यह तो बहुत सज्जन है। वे स्कूटर में बैठ गए।’ कृष्ण मंदिर ले चलो’ बोले। “मंदिर में तो हंगामा हो रहा है, वह बोला। ” उसी को तो दूर करना है” भगवान बोले।
स्कूटर वाला उजबक सा उन्हें देखता रहा और फिर बोला ” वहाँ जाकर मुझे अपना स्कूटर नहीं तुड़वाना। मैं नहीं जाऊँगा वहाँ। तुम उतरो अब।”
“अरे भाई, कुछ नहीं होगा तुझे और इसे। ले चल मुझे वहाँ। केवट की नाव को भी कुछ नहीं हुआ था। ”
“मुझे किसी केवट से कुछ नहीं लेना देना। उतरो तुम।” भगवान को  उतरना पड़ा।
“बेकार में इतना टाईम वेस्ट करवा दिया।” वह  बुड़बुड़ाते हुए आगे बढ़ा ।
“क्रोध मत करो वत्स। यह लो तुम्हारे टाइम की कीमत ” कहते हुए भगवान ने  उसे अपना मोर- मुकुट थमाया और पैदल ही मंदिर की ओर  लपके। मोर -मुकुट देख कर  आटो वाले का माथा ठनका । मोर मुकुट भगवान की ओर उछाला। मुझे नहीं चाहिए यह। यह तो भगवान जी का है। तो तुम ही हो, जिसने मंदिर से मूर्ति को चुराया है? रूको तुम। फिर वह चिल्लाया ” अरे कोई पकड़ो इसे । यही है मूर्ति चोर।”  मैं तो हूँ ही माखन चोर, चित चोर, तुम्हारी मूर्ति ” भगवान मुस्करा कर बोले और फिर अपना मुकुट उठाकर ,
यह जा और वह जा। अब वे सीधे मंदिर में पहुँचे और कक्ष में मूर्ति रूप में विराज मान हो गए। मन ही मन सोचने लगे, इससे ज्यादा बढ़िया सुरक्षित जगह कहीं नहीं है।
उधर मंदिर में भयानक कोलाहल मचा था।  सुबह से शाम हो आई थी। मंदिर के चौकीदार की जमकर आवभगत हो रही थी। उसके पास से भगवान की बाँसुरी जो बरामद हुई थी। बेचारा बार- बार एक बही  बात कह रहा था।सफाई देते -देते परेशान हो  गया था। कोई उसकी कुछ नहीं सुन रहा था। लेकिन भगवान से उसकी दुर्गति  देखी नहीं गई। पछताए बेकार ही चेंज के चक्कर में ,पड़े। अपनी और बेचारे इस दुखियारे की  ऐसी तैसी करवा ली। अब इसे बचाना  उनका नैतिक दायित्व है। उन्होंने फौरन ही उसके हाथ में पकड़ी बांँसुरी को उड़ा दिया। सब हक्के -बक्के यह  दृश्य मुँह बाए यह देख रहे थे। चौकीदार चिल्लाया “पकड़ो बाँसुरी को। यह भी वैसे ही गायब हो रही है, जैसे वह मूर्ति चोर हो गया था। ” अब लोगों को चौकीदार की बात पर विश्वास हो गया और उन्होंने उसे छोड़ दिया। पर मूर्ति कहाँ गई, यह मामला जस का तस था।
इसी समय बांसुरी की ध्वनि वहाँ गूँज उठी। मंदिर का पंडित और सारा जनसमूह भगवान के कक्ष की और भागा तो पाया मूर्ति तो वहीं विराजमान हैं। किसी को अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ। केवल चौकी दार भगवान की प्रतिमा के पैर पकड़ कर बिलख उठा,” मुझे बचा लिया कृपानिधान  अब ऐसा खेल मत करना।” उधर भगवान मन ही मन कह रहे थे, तुम्हें नहीं, मैंने खुद को बचा लिया। बाहर की दुनिया तो सचमुच बड़ी बेढब है। इसका कुछ तो करना ही होगा।”

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

 

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