साहित्य

गुजरते हुए साल की कविता

संजय मृदुल

 

न बातें धरिये जी में
जो बातें फिजूल हैं
झाड़ फेंकिये गर्द बातों की
मन मलिन न कीजिये
सूर्य किरण सी मुस्कान को
यूँ न धूमिल कीजिये
अपने ही देते हैं चोट मन पर
दिल बड़ा कीजिये माफ कीजिये
अपने है इसीलिए ऐसा कर जाते हैं
अजनबी कहाँ दिल दुखा पाते हैं
रखिये मजबूत खुद को चट्टान सा
न पड़ने दीजिये असर मौसम का
कौन क्या कहता है न सोचिये
उनके साथ खुश रहिये जो
आपके साथ खुश रहना चाहते हैं।
©संजय मृदुल
रायपुर

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