
गिरा के ख़ुद को भी आंखों कहकहा लूट लिया
किया उसी ने भी धोखा अन कहा लूट लिया।।//१//
नज़र लगी किसकी हैं मुझे अभी भी लगता
मगर यहां पे ठहर के फ़लसफ़ा लूट लिया।।//२//
नज़र बड़ी थी छुपी सी सितम दे कर भी ज़ालिम
मुझे कसम दे के जाने मुस्कुरा लूट लिया।।//३//
कभी भी ख़ुद को न केवल जुड़ा के रक्खा था
ज़र्रा ज़र्रा में न देखा गुनगुना के लूट लिया।।//४//
फ़लक पे रख के सितारे गगन में ले जाते
दिया झुठा वो सितम फ़िर बुदबुदा के लूट लिया।।//५//
कनक




