साहित्य

कैसी है ये तेरी यादों की परछाई

उदय किशोर साह

कैसी है ये तेरी यादों की परछाई
भीगी है मेरी आँखें ये रातों की तन्हाई
कहाँ से लाई थी ये बेशर्म बेवफाई
हो रही है जग मै मेरी प्यार की रूसवाई
वो पूनम की चाँदनी वो पीपल की छाँव
जहाँ मिले थे कभी हम दोनों हुई थी सौ बात
वो निदिया की बहाव वो फिजां की जज्बात
जहाँ दिखते थे रोशनी लगता था   शब्बैरात
निदिंया रूठ भग गई है मुझसे कासों दूर
किस जुर्म की सजा दी हमको मेरे हुजूर
पीपल की छाँव थी हमें कितनी ही सुहानी
जहाँ से शुरू हुई थी तेरी मेरी वो प्रेम कहानी
बहती नदिया की कल कल चंचल थी धारा
साहिल पे खड़े थे तब एक दुजै की बन सहारा
वादे कसमें हमने खाया था हर पल हजारो बार
प्रीत की रीत में हमने किया था तुम पे एतबार
तेरी अल्हड़ पायलिया जब करती थी गाँव में शोर
हम समझ लेते थे तेरी चाल की नई नवेली सी भोर
पनघट पे तेरा नित्य ही आना और मुस्कुरा कर जाना
तेरी हिरणी जैसी चाल को था मैने भी      पहचाना
खो जाते थे जब हँसीन वादियों में गुमसुम हम तुम
सजा देते थे बाँहों में भर कर तेरे ललाट पे कुमकुम
तेरा खामख्वाह रूठना और मेरा आरजू था तुम्हें मनाना
तेरी हुस्न की चकाचौंध ने मुझे बना दिया था तेरा दिवाना
किस बात से हमसे तुँ कर दी है ओ जालिम बेवफाई
कभी तो सुन लेती मेरी भी दलील व मेरी भी सफाई

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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