
कंटीली झाड़ी सम रिश्तों को न सींच, कर प्रस्थान
मुड़ कर देखने से चुभेंगे सिर्फ शूल न खिलेंगे फूल
कंकरीली पगडंडी को न आजमाएं, ठहर जाएं
छोड़ दो उस पथ को जो पथरीला हो दे घाव
मोड़ लो मुख अपना, बदल दो अपनी
डगर
वरना क्षत-विक्षत हो जाओगे इसी राह पर
बढ़ना है आगे तो छोड़ चलो, उलझे धागे
सुलझाने की न सोचों,खुद ही फंस जाओगे
उलझन से लहू-लुहान हो जाओगे,बच न पाओगे
शक्तिहीन जब हो जाओगे,जरूर मारे जाओगे
संघर्ष करते करते अपना अस्तित्व ही खो जाओगे
व्यक्तित्व क्या है तुम्हारा ये न कभी समझा पाओगे
स्वयं को ही खो बैठोगे अगर तो कैसे जी पाओगे
कटीली झाड़ी सम रिश्तों को न सींच, कर प्रस्थान
मीनाक्षी शर्मा ‘मनुश्री’
गाजियाबाद (उ.प्र.)




