
किसी कक्षा का
कक्षा-कक्ष
किसी देश,शहर,गाँव से
कम नहीं होता।
वहीं
जाति, वर्ग, भाषा, वेश,
सपने और सीमाएँ
एक साथ बैठी होती हैं,
जहाँ
समानता और असमानता
एक-दूसरे को रोज़ पहचानती हैं।
कभी
पीछे बैठा बच्चा
सपनों में आगे होता है,
तो कभी
पहली पंक्ति का विद्यार्थी
अपने भीतर हार छिपाए बैठा होता है।
यह कक्षा है –
जहाँ हर चेहरा
समाज का एक पन्ना है।
जब शिक्षक
हाथ में चाक लेकर
श्यामपट्ट पर लिखता है,
तो वह केवल शब्द नहीं उकेरता,
वह
पीढ़ियों के माथे से
विभेद की रेखाएँ
धीरे-धीरे मिटाता है।
हर अक्षर के साथ
समानता बोता है,
न्याय सींचता है,
और बंधुत्व को
भाषा देता है।
इसलिए
लोकतंत्र की सबसे छोटी,
लेकिन सबसे सशक्त
पाठशाला
कक्षा ही होती है –
जहाँ भविष्य
शांत स्वर में
अपने संस्कार सीखता है।
आकिब जावेद




