
बासंती हो बयार फिजाँ में,
मनभावन रुत चहुँ दिशि हो जब,
प्रेमगीत हों दिल में बजते,
हृदय हिलोरें लेता हो जब,
नैनन में बस जाती है अरु
रमणी पिय हिय जब रमती है,
तब जाकर कविता बनती है।
विरह वेदना जब उर में हो,
ललना मिलन की हो उत्कंठा,
नहीं मिलन हो पाता हो अरु,
रहे अधूरी मन की मंशा,
ऐसे में प्रेमी प्रीतम की,
क्रोध में भौंहें जब तनती हैं,
तब जाकर कविता बनती है।
करुण हृदय मानव को जब भी,
करुण दृश्य दिखलाई देता,
अश्रुधार उसकी बहती है,
हृदय रुदन है उसका करता,
दिल उसका छलनी हो जाता,
रक्त बिंदु हर सूं छनती है,
तब जाकर कविता बनती है।
जब समसामायिक जीवन में,
विशिष्ट कोई घटना घटती है,
हृदयविदारक दृश्य दीखता,
आत्मा जब चिल्ला उठती है,
कहीं पै जब इतिहास है रचता,
और नई कथा बनती है,
तब जाकर कविता बनती है।
प्रीत सफल हो जाती है जब,
प्रीतम को मिल जाती प्यारी,
मृदुल मधुर सपनों में ही जब,
जिन्दगी गुजर रही हो सारी,
पायल जब बजती है छन-छन
कँगन खन-खन जब करती है,
तब जाकर कविता बनती है।
– नरेश चन्द्र उनियाल,
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।




