साहित्य

लघुकथा- कु्त्सित तृष्णा

डॉ ऋतु अग्रवाल

“अरे! साली साहिबा! यहाँ बैठिए हमारे पास। आप तो बिल्कुल भी नहीं बतियातीं हमसे‌।”दिवाकर की आँखें शातिर लोमड़ी की तरह चमक रही थीं।
“ऐसा तो नहीं है जीजू! कहिए! क्या बात करनी है हमसे।” निवेदिता चाय की ट्रे मेज पर रखते हुए बोली।
अजी! बातें तो बहुत सारी हैं। आप बैठिए तो हमारे पास। इतनी दूर से भला क्या बात करें? अब साली तो आधी घरवाली होती है, हमसे भला यह दूरी कैसी?” निवेदिता का हाथ पकड़ कर दिवाकर बेशर्मी से मुस्कुराया।
“दीदी! जीजाजी बुला रहे हैं आपको। शायद कुछ चाहिए उन्हें।” झटके से अपना हाथ छुड़ाकर घृणित भाव से दिवाकर को दुत्कारती-सी निवेदिता ने अपनी बहन निहारिका को आवाज लगा दी।डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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