
सृष्ट मानव तू शिष्ट नहीं ,
हो सकते तू अनिष्ट नहीं ,
भारत का चौड़ा सीना तू ,
जिसके होते हैं पृष्ठ नहीं ।
तूने किसको प्यार किया ,
तूने किसे स्वीकार किया ,
होना चाहिए जो स्वीकृत ,
उसे तुमने इन्कार किया ।
वैसे हो सकते लाल नहीं ,
गल सकता है दाल नहीं ,
दिख रहा अब चाल कहीं ,
दिख रहा यह जाल कहीं ।
यों तो सृष्टि यह संसार है ,
जीना सबका अधिकार है ,
हॅंसी खुशी जीना रहना ,
नित्य मनाना ये त्यौहार है ।
प्यार में जीत और हार है ,
सृष्टि में ही सृष्ट व्यवहार है ,
सभ्य शिष्ट वाणी संस्कार है ,
मानवता हेतु चार विचार है ।
जीना संग में मरना संग में ,
सबको रंगना एक ही रंग में ,
रग रग निष्ठा भरा हो अंग में ,
पावनता ऐसे जैसे है गंग में ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।




