साहित्य

मौन माधव

ऋतु गर्ग

*मौन माधव*

माधव, आज क्यों नहीं तुम बोलते?
जब तराजू में वे नयनों को तोलते।

झलकती नैनों की भाषा,
बीच पगडंडियों पर ही कुमलाह गई।

औस बूंद-सी पिघलती रही,
वह एक आस लगाकर चलती रही।

माधव, क्या तुम उसके मन की
भाषा को समझ पाए?
क्या उसके सूखे अधर कुछ कह पाए?
बोलो माधव, बोलो…

क्यों वह रिक्त होकर
अकेली चलती रही?

तुम्हारे साथ भी—
फिर भी क्यों वह अकेली रही?
कुछ तो बोलो माधव…

ऋतु गर्ग, सिलीगुड़ी पश्चिम बंगाल

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!