
इच्छाएँ जाने क्यों हो जाती हैं चुपचाप कहीं गुम,
होठों पर मुस्कान रखकर, आँखों में रह जाता है नम।
जो सपने दिल ने पाले थे, अंदर जाने क्यों हो जाते हैं गुम ।
एक समय बाद,सब सूना लगता…
चाही हुई वस्तु मिलती नहीं समय से..
वक़्त की आँधी में बिखर गए, रह गई बस उनकी रेख,हम करते रहे हर दिन अनदेख…
कभी चाहा था खुलकर जीना, बेफ़िक्र हर पल,पर ज़िम्मेदारियों ने बाँध लिया, कसकर नहीं था कोई हल ..
जो कहना था, कह न सके, जो पाना था, छूट गया, अपनों के चक्कर में …
ख़ुद से करते रहे समझौते, और दिल मेरा ही मुझ से रूठ गया…
इच्छाएँ मरती नहीं हैं, बस सो जाती हैं कहीं,भीड़ में रहते हुए भी, तन्हा कर जाती हैं …
कभी किसी गीत में जागें, कभी किसी ख़्वाब में,
तो कभी अचानक छलक पड़ें, आँसू बनकर आँख में…….
फिर भी उम्मीद का दिया, मन में जलाए रखते हैं कभी तो सब बदलेगा….
कुछ बदल नहीं पाए हम,खुद को ही बदल कर शायद चले जाएंगे हम…
टूटी हुई इच्छाओं को, धीरे-धीरे सहलाते हैं…..
सोचते हैं …
अब पूरी हो जाए मगर सच में अधूरी ही रह जाती है…. इच्छाएं
सीता सर्वेश त्रिवेदी जलालाबाद शाहजहांपुर



