साहित्य

निगाहें धीरे -धीरे गाती

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

आँखें कुछ कह जाती,
मन के सारे भेद खोल जाती।
खामोशी में भी शब्द बनकरl
दिल की थरथर धुन बोल जाती।

पलकों पर ठहरा सा मौसम,
सूखी प्यास गीली हो जाती।
नज़रें छू लें यदि अपनाईl
बर्फ़ीली रातें भी पिघल जाती।

चेहरे पर लिखे न लिखे जो,
आँखें सब स्पष्ट बताती हैं।
मन में छिपी हुई कथाएँ,
निगाहें धीरे–धीरे गाती हैं।

कितना सरल है समझना तुमको—
जब आँखों से तुम मुसकाते हो।
रिश्तों की गहराई का रहस्यl
इक झटके में यूँ समझ आ जाते हो।

जब नज़रों में कोई तूफ़ान होl
तो सपनों का समंदर डोल जाता है।
एक चमक भर से उम्मीदों का
सूना आँगन भी फिर बोल जाता है।

आँखों में तेज़ दिपदिपाता सा,
मानो सूरज का साहस झिलमिलाए।
और कभी बरसती नर्म बूँद बनl
मन का सारा बोझ हल्का कर जाए।

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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