साहित्य

नज़्म

सोनिया अक्स

आख़िर मैं रफ़्ता रफ़्ता उसके जहाँ से निकली
राहे-वफ़ा पे चलकर ज़ुर्म-ए गुमाँ से निकली
**
मैंने उसे सम्हाला वो जब भी लड़खड़ाया
मझधार में फंसा तो साहिल उसे दिखाया
तहरीर क़ुर्बतों की मेरी ज़ुबाँ से निकली
राहे-वफ़ा पे चलकर ज़ुर्म-ए गुमाँ से निकली
**
रंजूर हो रहा है, मेरा हर इक फ़साना
ग़म कह रहा है मुझसे, तू फिर भी मुस्कुराना
ख़ुद भी ख़बर नहीं है कब मैं कहाँ से निकली
राहे-वफ़ा पे चलकर ज़ुर्म-ए गुमाँ से निकली
**
अब वक़्त हो चला है घर लौट के मैं जाऊं
सोनम जो ज़िंदगी है उसको ही अब निभाऊं
आना पड़ा ज़मीं पे जब कहकशां से निकली
राहे-वफ़ा पे चलकर ज़ुर्म-ए गुमाँ से निकली
आख़िर मैं रफ़्ता रफ़्ता उसके जहाँ से निकली

सोनिया अक्स

*******

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!