
भावनाएं मन की पढ़ लेता है पिता।
कर्मपथ पर हमें चला देता है पिता।।
गीता के श्लोक से होते हैं वचन जिसके।
हर शब्द मंत्र सा लगता वो होता है पिता।।
अंतर के द्वंद से जो बाहर निकाल देता है।
उलझी हुई पहेली को जो सुलझा देता है।।
रात दिन जो हाड़ तोड़ मेहनत कर कमाता।
मन की वेदनाएं मगर जो हरगिज न कहता।।
चेहरे पर ला देता है खुशियां घर में सबके।
पिता ही है जो भावनाओं में कभी न बहता।
पिता की आंख से जो बच्चे डरते रहे।
वो जीवन में अनुशासन का पाठ पढ़ते रहे।।
कौन जाने किसका भाग्य कहाँ ले जाएगा।
पिता मगर इमारत के कंगूरे गढ़ते रहे ।।
तात तुमको याद कर अश्रु बहे जा रहे।
शब्द शब्द टूटते,शब्द – शब्द जुड़ रहे।
आशीष से तुम्हारे गीत गजल छंद लिखे।
भावों की प्रस्तुति में ,याद तुम आ रहे।।
-डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित
कवि,साहित्यकार
98 पुरोहित कुटी,श्रीराम कॉलोनी
भवानीमंडी,जिला झालावाड़ राजस्थान




