मेरी इस कलम का,वहीं बेहूदा पन……….
वही बे अदब ढंग, वहीं बेहया ढंग
वही नाजो नखरे, वही शानो शौकत
वही बेशर्म पन, वहीं बे धर्म पन,
वही बे अदब ढंग, वहीं बेहया ढंग
वही नाजो नखरे, वही शानो शौकत
वही बेशर्म पन, वहीं बे धर्म पन,
मेरी इस कलम का, वहीं बेहूदा पन,
चाहे ताज ए तख्तो,चाहे साज़ ए सपनों
चाहे छोटी कली हो ,या सफाखे बदन
बड़ी है यह मगरूर , बड़ी सरचढ़ी है
कहीं हो जनाजा, वहां भी चली है
कहीं हो निकाह, वहां भी चली है
चाहे राज का दिल हो, चाहे राज दिल का
बड़ी है यह सितमगर ,बड़ी है यह काफिर
न छोड़ा किसी को, न बक्शा किसी को
ये सब पे चली है ,ये सब सबसे खरी है
सुनो ए राज बस तेरे कहने से चली है
चाहे ताज ए तख्तो,चाहे साज़ ए सपनों
चाहे छोटी कली हो ,या सफाखे बदन
बड़ी है यह मगरूर , बड़ी सरचढ़ी है
कहीं हो जनाजा, वहां भी चली है
कहीं हो निकाह, वहां भी चली है
चाहे राज का दिल हो, चाहे राज दिल का
बड़ी है यह सितमगर ,बड़ी है यह काफिर
न छोड़ा किसी को, न बक्शा किसी को
ये सब पे चली है ,ये सब सबसे खरी है
सुनो ए राज बस तेरे कहने से चली है
डॉ.राजेश श्रीवास्तव



