साहित्य

तूने पहचाना नहीं

वीणा गुप्त

मत खोल अपने घाव ,
नादान यहांँ पर,
मरहम न लगाए कोई,
न मिलेगा सुकून।
तूने पहचाना नहीं,
ये नमक का शहर है।

आस मत कर यहांँ,
किसी रहनुमा की,
अरसा हुआ गुजरे,
मोहब्ब्त के ज़माने को।
हैवान बेख़ौफ घूमे यहांँ,
बरपा कहर है।
तूने पहचाना नहीं,
ये नमक का शहर है।

पैरों के छाले अपने,
खुद ही सहला ले।
रास्ते पथरीले हैं,
कांटे भी बहुत हैं।
रात घनी अंधेरी,
डरी-सहमी सहर है।
तूने पहचाना नहीं,
ये नमक का शहर है।

रुक गया है पानी,
बू नफ़रत की आ रही।
हिंसा और खून की,
फसलें उगा रही।
कर ले किनारा इससे,
ये कैसी नहर है।
तूने पहचाना नहीं,
ये नमक का शहर है।

लफ्ज़ सुन प्यार के ,
गा़फिल नहीं होना।
नादां है दिल माना,
पर तू होश मत खोना।
रेशम में लिपटी छुरी का,
मीठा ये ज़हर है।
तूने पहचाना नहीं,
ये नमक का शहर है।

ईमान,अदब से गिरी,
लाख लानतें भरी,
गुनगुना रहा है जिसे,
ज़माना बेहया,
खिजां को बुलाती,
यह कैसी बहर है।
तूने पहचाना नहीं,
ये नमक का शहर है।

लगा ऐसा कि खो गए,
अब सारे रास्ते।
हारा-थका तू बैठा,
मगर किस वास्ते।
डगर नई बना ले,
तुझ पे ख़ुदा की मेहर है।
तूने पहचाना नहीं,
ये नमक का शहर है।
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वीणा गुप्त
नई दिल्ली।

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