
चलों न
दूर और चले
साथ साथ
चलना ही तो है
तुम भी चुप हो
मै भी चुप
फिर क्या परेशानी
न तुम्हारी कोई
चाह
न मेरी कोई
चाह
बस साथ साथ
चलना है
कुछ दूर और
मन नहीं भरा है
चाहता हूँ
थोड़ा और साथ
रहे
शायद तुम नहीं
चाहती
क्यों नहीं जानता
शायद इस लिए भी
कि, जब कुछ सम्भव नही
तो व्यर्थ क्यों
मन को दुःखी करें
आज अभी तो
साथ साथ चलना भी
अच्छा लग रहा है
कल शायद यह
साथ साथ चलना भी
याद आ
परेशान करें
चलों सही है
तुम्हारी भी सोच
तो फिर
चलों चले वापस
अपने घर
तुम तुम्हारे घर
मै मेरे घर
वैसे कहने को घर है
पर जहाँ जा कर भी
हम अकेला महसूस करें
यह कैसा घर
इस से तो अच्छा ही
ये सड़क जो
साथ साथ चलने मात्र से
दे रही हैं
अजीब खुशी
जो शायद दुनिया की
तमाम खुशी से
बड़ी और सुखद है
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




