
आज का मानव विभिन्नता के,
आवरण ले घूम रहा।
कभी देव, कभी सज्जन,
कभी भलाई का मुखौटा ओढ़ा हुआ।।
पल में दिखलाए झूठी मुस्कान,
कुटिल भरे चेहरे पर।
सज्जनता दिखला कर लोगों को,
करता समाज में भीतर घात।
बहलाना, फुसलाना आम बात,
ऐसे चतुर भीतरघाती लोगों का।
जयचंद कहें या विभीषण कहें,
कुटिलता की सीमा लांघ रहा।
गिरगिट भी इतने रंग अपने,
जीवन में कभी न बदले।
लाज के मारे वो बेचारी,
विभिन्न रंग मानव के देख गुमसुम बैठी।
माना विभिन्नता प्रकृति भी दिखाती,
पुष्प से लेकर, धरा में विभिन्न रंग लाती।
विभिन्नता भले रखो अपने में,
लेकिन सीमित हो गुणों तक वे।
चरित्र में विभिन्नता न लाओ,
जैसे भीतर से वैसे ही बाहर दिखाओ।
नन्द किशोर बहुखंडी
देहरादून, उत्तराखंड




