साहित्य

भावनाओं का दस्तावेज – ‘मेरे राम, सबके राम’

गिरीश पाण्डेय ‘काशिकेय’

साहित्य समाज का केवल दर्पण ही नहीं बल्कि मार्गदर्शक भी है। गोण्डा निवासी सुधीर श्रीवास्तव, जो ‘यमराज मित्र’ के उपनाम से भी जाने जाते हैं, के द्वारा रचित छंदमुक्त कविताओं का संग्रह ‘मेरे राम, सबके राम’ बयासी मुक्त छंद कविताओं का संग्रह ऐसे समय आ रहा है, जब समाज को मार्गदर्शी साहित्य की नितांत आवश्यकता है ।
उपभोक्तावादी संस्कृति, राजनीतिक -सामाजिक जटिलताओं तथा तकनीकी प्रधान इस दौर में कविता अपने लिए फिर से नई ज़मीन तलाश रही है। कवि और कविता आज बड़े पशोपेश में है कि जड़ों को सुरक्षित रखते हुए नये पत्ते कैसे निकलें। तकनीक को स्वीकार करते हुए मनुष्य के भीतर की संवेदना को कैसे बचाए रखा जाय, आज की कविता से यह भी आशा की जा रही है। सुधीर श्रीवास्तव का यह काव्य-संग्रह इन्हीं मानवीय संवेदनाओं, रिश्तों, पीड़ा और धार्मिक भावनाओं का एक दस्तावेज़ सरीखा है।

आइये! इनकी कुछ कविताओं का जायजा लेते हैं –
‘सिक्के के दो पहलू ‘ शीर्षक की कविता भावनात्मक उद्वेग नहीं है, बल्कि जीवन दृष्टि का उद्घोष है। यह जीवन में शंकराचार्य के अद्वैत नहीं, द्वैत का दर्शन कराती है।
जीवन सुख-दुख, आशा-निराशा, हार-जीत आदि युग्मों से आगे बढ़ता है। कविता की अंतिम पंक्तियां हैं –
सिक्के का एक पहलू तो हो ही नहीं सकता
या फिर यह मान लीजिए
कि जीवन और सिक्के के
दो पहलुओं का होना
अकाट्य और अटल सत्य है।

‘मौन व्रत तोड़ दूंगा’ शीर्षक की कविता अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने को प्रोत्साहित करती है। ऐसे मौके पर कवि मौन तोड़ने की सलाह दे रहा है –

अनर्गल, मिथ्या आरोप मत लगाइए,
वरना मैं भी मौन व्रत तोड़ दूंगा।

‘जीवन में उतार -चढ़ाव ‘ नामक कविता बुझे मन को एक सम्बल प्रदान करती है। निम्न पंक्तियों के माध्यम से कवि कहता है कि उतार चढ़ाव तो सभी के जीवन का अभिन्न अंग है, निराश मत होइए –
जीवन में उतार चढाव का हमसे ही नहीं
हर किसी से बड़ा गहरा नाता है
ऐसे ही जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं तथा भावनाओं पर आपने क़लम चलाई है।

अभिमान, ख़ामोशी, सहनशीलता जैसे भावों एवं पिता एवं अन्य रिश्तों पर आपके शब्द एक नया अर्थ दे रहे हैं। जय हनुमान, माँ शारदे की आराधना, श्री राम, मेरे राम, अयोध्या से अयोध्या धाम, सत गुरु चालिसा जैसी कविताएनं पाठक को अध्यात्म से जोड़ती हैं। प्रकृति केंद्रित रचनाएं भी अच्छी बन पड़ी हैं।

संग्रह की भाषा सरल, सहज एवं आत्मीय हैं। कवि के जीवन के व्यक्तिगत संघर्ष ने कविता को लोक – संवेदना से भर दिया है।
पुस्तक का नामकरण ‘मेरे राम, सबके राम’ कवि का ईश्वर के प्रति समर्पण दर्शाता। जब सब कुछ राम ही कर रहे हैं, तो यह कृति भी राम की हुई और जो राम का हो गया, यमराज का मित्र तो सहज ही हो गया। ऐसे यमराज के मित्र को मेरी हजार शुभकामनाएं!

गिरीश पाण्डेय ‘काशिकेय’
( कवि एवं लेखक )
वाराणसी
मो. 9451229071

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