
खिचड़ी की कहानी, हम सबकी जुबानी,
थाली में उतरी तो बन गई रानी।
न दाल अकेली, न चावल सयाना,
दोनों ने मिलकर रच दिया अफ़साना।
गरीब की थाली, अमीर का सहारा,
बीमार को लगती सबसे न्यारा।
ना इसमें तड़का ज़्यादा-सा भारी,
फिर भी लगती सबसे प्यारी।
माँ बोले— “खा ले, ताक़त आए,
बाबा बोले— “पेट को राहत पाए।
डॉक्टर कहे— “यही सही इलाज,
और जीभ बोले— “बस थोड़ा सा स्वाद!
न दंगे कराए, न झगड़ा करवाए,
हर मजहब को एक कौर बन जाए।
कभी देसी घी, कभी अचार की संगत,
खिचड़ी निभाती हर रिश्ते की संगत।
शनिवार की रात हो या बीमार की सुबह,
खिचड़ी में मिल जाती जीवन की रुबाब।
सादी सी दिखती, गहरी है कहानी,
खिचड़ी में बसती हम सबकी जुबानी।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश



