साहित्य

देश के नेताओं

जयचन्द प्रजापति 'जय"

कुछ ऐसी चाल चलो
खिल जाये चमन

बहे मस्त पुरवाई
होंठो पर खुशी छलके

लाना ऐसी योजना
महक-चहक पड़े

सूनी गलियां भी
चौराहे पर खड़ा आदमी

जय-जयकार करे
ऐसे नेताओं की

जिसमें नहीं है मानव कल्याण
क्या करेगा देशसेवा

झूठे वादों पर
नहीं टिकती राजनीति

ऐसी राजनीति
अलाव की तरह है

जहां सिर्फ राख बचती है
सुनों, देश के नेताओं
मेरी बात सुनों!

जयचन्द प्रजापति ‘जय”
प्रयागराज

कविता का भावार्थ

यह कविता जयचन्द प्रजापति ‘जय’ द्वारा रचित एक तीखा व्यंग्य है, जिसमें देश के नेताओं को संबोधित करते हुए सच्ची देशसेवा और मानव कल्याण की मांग की गई है।

कवि कहते हैं कि नेताओं को ऐसी चालें चलनी चाहिएं जिनसे देश का चमन खिल उठे, मस्त पुरवाई बहे, होंठों पर खुशी छलके और सूनी गलियाँ भी महक-चहक उठें—यानी जनता के जीवन में समृद्धि, उल्लास और सुख का आगमन हो। चौराहों पर खड़े आम आदमी भी ऐसे नेताओं की जय-जयकार करें।

लेकिन वर्तमान नेतृत्व पर प्रहार करते हुए कवि चेताते हैं कि जिसमें मानव कल्याण न हो, वह देशसेवा व्यर्थ है; झूठे वादों पर टिकी राजनीति अलाव की भाँति है, जहाँ सिर्फ राख बचती है—कोई स्थायी लाभ नहीं। अंत में पुकारते हुए कहते हैं, ‘सुनो, देश के नेताओं, मेरी बात सुनो!’—यह एक आह्वान है सार्थक राजनीति और वास्तविक परिवर्तन के लिए।

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