
मुझे कोई छन्द, न कोई विधा आती,है
ना मात्राओं का हिसाब जानती हूँ।
जो लिखती हूँ, दिल की कलम से लिखती हूँ
जो जीती हूँ, वही काग़ज़ पर उतारती हूँ।
ना शब्द सजाने का हुनर सीखा मैंने,
ना अलंकारों की कोई पहचान है।
मेरी कविता में बस सच रहता है,
दर्द, उम्मीद, आँसू और मुस्कान।
जो टूटा, वही अक्षर बन गया,
जो सहा, वही पंक्ति हो गया।
दिल ने जब-जब आवाज़ दी मुझको,
कलम ने बिना सोचे लिख दिया।
कहते हैं ये नियमों में नहीं बंधती,
मैं कहती हूँ — दिल की भाषा है।
कविता अगर छू ले किसी का मन,
तो वही मेरी सबसे बड़ी परिभाषा है।
इसी लिए तो कहती हुँ
जो लिखती दिल की कलम से लिखती हुँ ll
पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर



