साहित्य

जी चाहता है कि मन फिर से बच्चा हो जाए

एस के कपूर"श्री हंस"

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जी चाहता है कि मन फिर से बच्चा हो जाए।
छल – कपट से दूर सारा तन – मन सच्चा हो जाए।।
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पलभर में कट्टी पलभर में बट्टी रहे न भाव क्लेश का।
जीवन से ही दूर हो जाए हर भाव घृणा -द्वेष का।।
बस हर नफरत की गांठ का धागा कच्चा हो जाए।
जी चाहता है कि मन फिर से बच्चा हो जाए।।
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दया करुणा दोस्ती निस्वार्थ निश्चल प्रेम जग जाए।
स्वार्थ राग- विद्वेष कुभावना का हर रंग कट जाए।।
निष्कपट निष्काम प्रेमभाव से मन की सज्जा हो जाए।
जी चाहता है कि मन फिर से बच्चा हो जाए।।
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सीधी सरल सच्ची हर बात हो जाए बच्चों जैसी।
हर गुनाह से दूर बस दिन-रात हो जाए बच्चों जैसी।।
झूठ से दूर हर मुस्कान का रंग पक्का हो जाए।
जी चाहता है कि मन फिर से बच्चा हो जाए।।
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।।एस के कपूर”श्री हंस”
बरेली।।

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