साहित्य

भोले संग चलूंगा

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी 'राम'

मैं तो भोले संग चलूंगा,
कदम-कदम हर रंग भरूंगा,
जीवन की चलती गाड़ी में,
मुस्कानों के रंग भरूंगा।
मैं तो भोले …
जहां-जहां भक्ति भोले की,
वहां-वहां मैं रहा करूंगा,
मन की वीणा के तारों में,
नई धुनें मैं सृजन करूंगा।
मैं तो भोले ….
सन-सन करती हवा शीत की,
पेड़ों को सहलाती है,
संग भोले का पाकर वह भी,
मंद-मंद मुस्काती है।
मैं तो भोले ….
जब-जब होंठ नाम लें भोले,
ऊर्जा से भर जाते हैं,
कंपन तन का सारा पल-में,
भोले ही हर जाते हैं।
मैं तो भोले …
मौसम की अदला-बदली में,
कभी-ना घबराना सीखें,
आओ भोले के संग रहकर,
पाठ नया जीवन का सीखें।
मैं तो भोले …
(249/307 वां मनका)
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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’
गांधीनगर, इन्दौर (म.प्र.)

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