
घर में बैठे- बैठे सामान सी हो गई मैं
दूर मैं हर इंसान से हो गई मैं
चिड़िया चहक उठाती मुझको
सूरज सुबह जगाता है
हवा में पत्ते झूम झूम कर
मेरा दिल बहलाते हैं
फूलों पर बैठे भौंरे
मधुरम गीत सुनाते हैं
देखते देखते विहंगम दृश्य ओझल हो
होले से शाम बुलाती
पक्षी लौटते अपने घोंसले
टन -टन गायों की घंटी सुनती हूँ
पशु वापस घर को जाते
झटपट आता चांद तारों संग
जड़ा सितारा चादर लेकर
पलक मूंदकर ख्वाब सजाती
पहरे पर खिड़की पर बैठा
चाँद को मैं देखा करती
यही है दिनचर्या अब
जाने कठिन समय बीतेगा कब।
डॉ.पुष्पा सिंह




