साहित्य

50-60 का दशक-अतीत की सैर का पार्ट-2

ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव

गर्मी छुट्टी में तिवरे कौड़ी,गुटटी भी था खेला।
झाबर चिल्होर आइस पाइस,ये भी था खेला।।

कंचा गोली गुल्ली डंडा,चिब्भी है हमने खेला।
रस्सी कूद लुका-छिपी,के खेल थे खूब खेला।।

बंदर डमरू मदारी के,ये खेल गाँव में देखा है।
दुलदुल घोड़े की नाच,धोबी नाच भी देखा है।।

कुर्मी अहिर के नाच देखे,मोर नाचते देखा है।
कठपुतली खेल देखे,रस्सी पे नाचते देखा है।।

कक्षा में गुरु समक्ष,ये किताबें वांचते देखा है।
पं. जी को सत्यनारायण,कथा वांचते देखा है।।

बुलबुल तोते बिल्ली कुत्ते,घरों में पलते देखा।
बत्तख कबूतर तितर मोर,घरों में पालते देखा।।

दो बैलों के जोड़ी से,खेतों में हल चलते देखा।
बैलगाड़ी से सामान धुलाई,बचपन में ये देखा।।

बैलों की जोड़ी से कुंए,पानी पुरवाही देखा है।
मोट कुँए से पानी खींचे,इससे सिंचाई देखा है।।

बैलों की जोड़ी से मैंने,अन्न की मड़ाई देखा है।
बैलों से कोल्हू चला,सरसो तेल पेराई देखा है।।

नानी ने कढ़ी मीठा पना-बरा,बना खिलाया है।
मुंगौरी रसाज खरिके,चूनी-रोटी ये खिलाया है।।

गुड़ सौंफ लौड़ आम से,बने गुड़म्में खिलाया है।
मिट्टी की छत पे उगे भुइंफोर,बना खिलाया है।।

आम के मौसम में दादी,अमावट बना खिलाया।
देशी घी-आटे का हलवा,खूब बनाया खिलाया।।

चूल्हे की सोंधी रोटी है,अम्मा ने सेंक-खिलाया।
मटकी में जमाई साढ़ी दार,दही खूब खिलाया।।

महुआ लाटा परमल,राब पितूरा तिल्ली खाया।
दूध तिल में उबले महुआ,लप्सी गुलगुले खाया।।

सनई फूल सब्जी,अगस्त फूल पकौड़े हैं खाया।
जंगलजलेबी लसोड़े ढ़ेरे,पोईपत्ते पकौड़े खाया।।

लाल काले मीठे झमकोइये,पेटुआ भी हैं खाए।
अलसी बर्रे खिन्नी मौलश्री,देशी आम भी खाए।।

अपने खेतों के चने साग,मटर का पल्ला खाए।
अरहर मटर की छीमी,खूब तोड़े और हैं खाए।।

रसियाव जर्दे मीठेचावल,बबरे गुड़धनिया खाए।
शहर से जबभी निज गाँव गए,देशी चींजे खाए।।

चने मटर अरहर ज्वार,बाजरे के चबैने हैं चबाए।
जोंधरी बजड़ी मोथे पेटुआ,गेहूँ चबैना हैं चबाए।।

नौटंकी सर्कस गंवई मेले,कृष्ण-रामलीला देखा।
नरकुल सेंठा निबकलम,तख्ती लिख पढ़ देखा।।

विविध भारती रेडियो न्यूज़,दूरदर्शन टीवी देखा।
बीबीसी लंदन न्यूज़,बिनाका गीतमाला है देखा।।

पहलवानों के कुश्ती दंगल,हरे-भरे खेत थे देखे।
सरपत के बल्ला से बुना,बेना भौंकी दौरी देखे।।

अम्मा बुआ चाची दादी,के बल्ले सरफुन्दी देखे।
नानी दादी अम्मा चाची,के सिकहुले बुनते देखे।।

कांड़ी में कूटें चकरी से दरें,जाँत पिसा आटे थे।
दादी-नानी द्वारा फूल,थाल पर घिसे आँजन थे।।

ये शुद्ध आँजन आँखों को,बहुत फायदा देते थे।
पुराने जमाने के सुरमे से,अच्छे आँजन होते थे।।

नहीं भूलता है बचपन का,वह दौर जो बीता है।
अभी और कितनी यादें हैं,जो ये कवि जीता है।।

आपस में कितना भाईचारा था कितनी ये यारी।
आज नहीं माहौल है वो,ऐसी हुई है दुनियादारी।।

उस बचपन को धन्यवाद,मेरा मैं उसका आभारी।
50-60 के उस दशक का,सदैव रहूंगा आभारी।।

ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक एवं समाजसेवी)

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