साहित्य

गिरवी रख दी

कनक

गिरवी रख दी उसने यार निशानी मेरी
कोई पुछता भी नहीं हैं वो कहानी मेरी।।//१//

मुश्किल है और सफ़र में ख़ुद चलना देखो
कोई सुनता भी नहीं है कि बयानी मेरी।।//२//

धोका फ़रेब करने में वह माहिर हैं जो
मेरा दिल भी तो शीशा है ज़ुबानी मेरी।।//३//

यूं जला दी उसने यार निशानी मेरी
उनको हाले दिल पे नाज जवानी मेरी।।//४//

रास आती भी नहीं है मुझको तो खोनी
रोज़ खुलकर के जिया हूं में रुहानी मेरी।।//५//

जब से देखा उसको हमने भी अपने दिल से
उनको हर बात पे लगती हैं पुरानी मेरी।।//६//

कनक

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