
गिरवी रख दी उसने यार निशानी मेरी
कोई पुछता भी नहीं हैं वो कहानी मेरी।।//१//
मुश्किल है और सफ़र में ख़ुद चलना देखो
कोई सुनता भी नहीं है कि बयानी मेरी।।//२//
धोका फ़रेब करने में वह माहिर हैं जो
मेरा दिल भी तो शीशा है ज़ुबानी मेरी।।//३//
यूं जला दी उसने यार निशानी मेरी
उनको हाले दिल पे नाज जवानी मेरी।।//४//
रास आती भी नहीं है मुझको तो खोनी
रोज़ खुलकर के जिया हूं में रुहानी मेरी।।//५//
जब से देखा उसको हमने भी अपने दिल से
उनको हर बात पे लगती हैं पुरानी मेरी।।//६//
कनक



