
ज़िन्दगी गुज़ार दी हमने
यूँही इन्तज़ार में
तुम्हारे लिए।
बुने थे कितने सपने
रंग बिरंगे हमने
तुम्हारे लिए।
याद करोगे मुझको तुम
कितना किया समर्पण
तुम्हारे लिए।
आज हुआ एहसास मुझे
व्यर्थ संजोये सपने
तुम्हारे लिए।
जोश जीवन गुम हुआ
व्यर्थ हुआ बदनाम
तुम्हारे लिए।
किया धरा ये तेरा
शायद है साधारण
तुम्हारे लिए।
कौन करेगा अब भरोसा
बिगड़ा सारा काज
तुम्हारे लिए।
‘सच्चिदानन्द’ हताश मत हो
आयेगा कोई अपना
तुम्हारे लिए।
(गोवर्धनसिंह फ़ौदार ‘सच्चिदानन्द’)
पता :मोरिश्यस।




