
मन यह खग सम क्यों उड़ता है,व्याकुल हो क्यों करता शोर।
क्षणिक खुशी जब-जब मिलती है,नाचे मन का आतुर मोर।।
भौतिक सुख का सुख नश्वर है,क्यों मन करता पुनः विलाप।
फिर से तृष्णा उर में आए,बनती तृष्णा क्यों अभिशाप।।
मन कठपुतली सम क्यों नाचे,माया क्यों पकड़ी है डोर।
क्षणिक खुशी जब-जब मिलती है,नाचे मन का आतुर मोर।।
फिर कुछ पाकर मन खोता है,खोना दे इस मन को पीर।
तुष्टि नहीं है कभी कहीं पर,देता क्षण में मन को चीर।।
आकर्षण ही नित्य लुभाए,सदा चुराए मन का चोर।
क्षणिक खुशी जब-जब मिलती है,नाचे मन का आतुर मोर।।
शांत नहीं यह मन रहता है,निस-दिन अंतस में संग्राम।
अंतर्मन में द्वंद्व सदा है,यात्रा यह होती अविराम।।
चंचल मन पर विजय प्राप्त कर,जीव! बढ़ो रे प्रभु की ओर।
क्षणिक खुशी जब-जब मिलती है, नाचे मन का आतुर मोर।।
वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’
वाराणसी
उ.प्र.




