साहित्य

हर गली मेरी अपनी हैं

संजय कुमार

घर से ये सोचकर निकला
हर गली मेरी अपनी हैं,
हर दरवाज़े पर दस्तक दी मैंने
तब जाना बेकदरी ही मेरी अपनी हैं,

हर गली में घुमा में, सब को देखा मैंने,
मतलब के हैं सब, घर से निकल कर जाना मैंने,
रिश्तों की दुहाई देते हैं, सब अपना कहते हैं,
टुटा, बिखरा तब जाना, माँ ही मेरी अपनी हैं,

घर से ये सोचकर निकला
हर गली मेरी अपनी हैं,
कदम कदम पर बेबस किया सब नें
तब जाना बेबसी ही मेरी अपनी हैं,

बस गया में अपनों की बस्ती में अपना समझ कर
टुकड़ों में बांट दिया मुझें गैर समझ कर,
बिखरे रिश्तों के टुकड़ों को सम्मल कर चलने लगा,
तब जाना मेरी माँ के घर की ही मिट्टी मेरी अपनी हैं,

घर से ये सोचकर निकला
हर गली मेरी अपनी हैं,
…….. संजय कुमार आगरा…..

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