
वक्त को अपना बनाया।
इसलिए लड़ना है आया।
जी लिया जी करके देखा,
साथ चलता एक साया।
महफ़िलें उसने सजा लीं,
जो निकल महफ़िल से आया।
बन गया नासूर शायद,
ज़ख्म जो उसने था पाया।
इन अंधेरों में उजाला,
खोजना था ख़ोज लाया।
फूल खुशबू रंग बादल,
सब प्रकृति ने ही रचाया।
वक्त को सिरहाने रखकर,
सो गये उनको जगाया।
वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
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