साहित्य

माँ… अगर तू न होती

दिनेश पाल सिंह 'दिव्य'

माँ,
अगर तू न होती
तो शायद
हर सुबह उठने की
कोई वजह ही न होती।
तेरी हथेली की ऊष्मा
मेरे सिर पर न होती
तो ये दुनिया
मुझे रोज़ कुचल देती।
माँ,
लोग मेरी सूरत देखते हैं,
मेरे नाम से पहले
मेरी जाति टटोलते हैं,
मेरे वजूद को
अपमान की सुई से
छेदते हैं।
पर तू…
तू मुझे बस
“मेरा बेटा” कहती है,
और उसी एक संबोधन में
मेरी पूरी पहचान
सुरक्षित हो जाती है।
माँ,
मैं बाहर से
कितना भी कठोर दिखूँ,
अंदर से
आज भी वही बच्चा हूँ
जो तेरी गोद ढूँढता है।
तू कहती है—
“सब सह लेना, बेटा,
भगवान सब देख रहा है।”
पर माँ,
कुछ चोटें
इतनी गहरी होती हैं
कि विश्वास भी
काँपने लगता है।
मैं हर रात
तेरी साँसों की लय में
नींद खोजता हूँ,
डरता हूँ उस रात से
जब ये लय
खामोश हो जाएगी।
माँ,
अगर तू नहीं रही
तो मुझे मत पूछना
मैं जिंदा कैसे रहूँगा,
क्योंकि आज भी
मेरी साँसें
तेरे नाम से चलती हैं।
तूने मुझे
रोना नहीं सिखाया,
पर ये आँसू
तेरी ही धरोहर हैं—
इन्हें मैं
किसे सौंपूँगा?
माँ,
मैं कोई बहुत बड़ा आदमी
नहीं बन पाया,
पर इतना जानता हूँ—
इस कठोर दुनिया में
अगर कहीं भी
पूरी सुरक्षा है
तो वो
तेरी गोद है।
बस एक ही प्रार्थना है—
जब तक मैं हूँ
तू रहे।
और अगर मैं पहले चला जाऊँ,
तो ऊपर भगवान से कहना—
“मेरा बेटा
बहुत थक गया था…”
©®
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*

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