साहित्य

गजल

बंदना मिश्रा

चाह मन में नई नई जगाती रही।
हसरतें मन को झूला झुलाती रही।

जाने कब होगी पूरी अधूरी है जो।
ख्वाब दिल में अपने सजाती रही।

चाह कर भी उसे भूल पाई नहीं।
उम्र भर याद उसकी सताती रही।

दर्द सहने की आदत पड़ गई है।
चोट लगने पे भी मुस्कुराती रही।

बेवजह वो मुझे अब रुलाने लगे।
आंसू मै अपने सबसे छुपाती रही।

शिकवा करूं क्या मैं जिंदगी से।
जिंदगी जिंदगी भर रुलाती रही।

बंदना मिश्रा
देवरिया उत्तर प्रदेश

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