
आ गया फ़ागुन महीना दिल दिवाना हो गया,
इश्क़ का हर इक फ़साना शायराना हो गया।
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याद आती है तुम्हारी दिन सुहाने खो गए ,
बाग भी देता नहीं सुख कैदखाना हो गया।
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तुम नहीं तो कुछ नहीं मधुमास भी सूना लगे,
है हॅसी फीकी कृत्रिम ये मुस्कराना हो गया।
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खा रहे हम पी रहे पर मन सदा बेचैन है,
खिलखिलाते थे कभी हम इक जमाना हो गया।
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ईश का है ध्यान करना बस सुमन वो कर रही,
लिख रही है गजल कविता आजमाना हो गया।डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




