
खुद की तलाश खुद के लिए ही कर रहा हूं।
जीवन सफर पर खुद को लेकर चल रहा हूं।
कौन हूं मैंऔर किस लिए आया जहां में।
किस लिए यह तन मिला है इस फिजा में।
लग रहा की राह अंधेरे बढ़ रहा हूं।
वक्त कम है काम जायदा ए दिल सम्भल जा।
राहें उल्फत पर हो बे खौफ चले जा।
यह इल्म तेरे लिए ही मैं पढ़ रहा हूं
फासले यू दरमियां के अब मिटा दे
कर भरोसा खुद ही खुद को जीना सिखा दे।
फक्र तुझको होगा एक दिन खुद के कर्म पर।
प्यार की मीनार कुछ ऐसी बना दे।
इंतजार तेरे कर्म का मैं कर रहा हूं।
जीवन सफर पर खुद को लिए चल रहा हूं।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश



