हाड़ कपावत जाड़ इउ पड़त नहीं है चैन,
कोहिरा करिआ है बहुत,खुलते नहीं हैं नैन,
दस बजि गा पर मन करत रहूं लिहाफ को ओढ़ि
हाथ-पांव कुछ चलत न,ना ही निकसें बैन।।
खिचराहिन तक रहति है,अब कछु राहत होई
तबै निकरिबौ है उचित,जाड़ु भी कुछ कम होई
पेंडिंग होइगा कामु सब,कैसे सब होई पाई
देखाई न हमका कुछ पड़ै,साथ न जानत कोई।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश




