
हे करुणाकर हे रघुनंदन, मेरे राम।
अवधपुरी में सरयू के तट, जिनका धाम।
हे घट वासी हे वनवासी, हो प्रभु आप।
दूर करो सब कष्ट हमारे,आकर आप।
डोले है जीवन की नैया , मेरे नाथ।
पार लगा दो भवसागर से, दे दो हाथ।
दीनानाथ कहाते हो तुम, जग करतार।
छोड़ोगे कैसे मुझको प्रभु, हे भरतार।
चारों ओर अँधेरा भारी, छाया घोर।
तुम बिन दिया सहारा किसने, जग में और।
कबसे नाथ पुकार रही हूँ, सुन लो अर्ज।
निर्बल को अपनाना भी है , तेरा फर्ज।।
सुखमिला अग्रवाल’भूमिजा’
स्वरचित मौलिक
जयपुर




