साहित्य

काठ की हांडी एक ही बार ही चढ़ती है – लोकोक्ति

मुकेश कुमार दीक्षित 'शिवांश'

 

काठ की हांडी देख लो
चढ़ती एक ही बार,
दादाजी कहते इसको
क्यों हम बारम्बार।
दादा बोले सुन पोते
कोई धोखाकरता ,
समझ हमें जब आ जाती
तब वह हमसे डरता ।
कहते फिर यहाँलोग सब
बनकर वे होशियार,
काठ की हांडी देख लो
चढ़ती एक ही बार।

मुकेश कुमार दीक्षित ‘शिवांश’
चंदोसी
मो०-8433013409
दिनांक-12-1-2026

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